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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Friday, July 7, 2017

पंचसंकट का निवारण एकतत्व के अभ्यास से ही संभव-पतंजलि योग दर्शन के आधार पर चिंत्तन लेख (PanchSankat ka niwaran ektatv ka abhyas se hi sambhav-A Article based on Patanjali yoga Darshan)

पतंजलि योग दर्शन के अनुसार
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दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः
                       हिन्दी में अर्थ-दुःख, दौर्मन्स्य (इच्छा की पूति होने पर मन का क्लेश), अंगमेजयत्व (शरीर में कंपन), श्वास और प्रश्वास-ये पांच संकट चित्त के विक्षिप्त होने के कारण होते हैं।
तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्तायासः।
हिन्दी में भावार्थ-इन संकटों के निवारण के लिये एकतत्व का अभ्यास करना चाहिये।
                            मनुष्य की देह में बुद्धि और मन का कोई भौतिक आधार नहीं है-यह रक्त के रूप में हड्डी के रूप में-पर यही पूरा जीवन उसका संचालन करते हैं। सामान्यजन ज्ञान के अभाव में इसी देह, बुद्धि और मन के साथ स्वयं को एकरूप समझते हैं जबकि योग साधक अभ्यास के बाद यह समझ जाते हैं कि देह, मन और बुद्धि हमारे साधन है जिनके हम आत्मरूप उपभोक्ता हैं।  यह जीवन रथ के घोड़े हैं और हम आत्मा उसके सारथि हैं।  जहां योग साधक मन या चित्त पर सवारी करते हैं वही सामान्यजन इनका इस तरह दास हो जाता है कि उसे अपने आत्मरूप अस्तित्व का अनुभव तक नहीं रहता।
                               संसार में भिन्न प्रकार के विषय हैं जिनमें मनुष्य का स्वाभाविक रूप से राग रहता है।  योगदर्शन के अनुसार क्लेश का जनक राग है।  जिस तरह मोर नाचने के बाद अपने मैले पांव देखकर रोता है उसी तरह मनुष्य भी विषयों के उपभोग से निवृत होने के बाद थकावट का अनुभव होता है। हमने देखा होगा कि अनेक मनुष्य गर्मियों में शीत तथा शीत के समय ग्रीष्म स्थानों पर पर्यटन करने के लिये जाते है। वहां से लौटने के बाद अपने ही घर में थकावट का अनुभव करते हुए अन्य लोगों की अपनी कथाओं के साथ व्यथा भी सुनाते हैं-उनके मन में बार बार थकावट का रुदन होता है। यह उनके चित्त की विक्षिप्त अवस्था होती है।  इसके विपरीत नियमित रूप से योगाभ्यासी को कभी भी चिंता या थकावट से त्रस्त नहीं देखा जाता।
                                   अनेक बार लोग थोड़ा चलने पर हांफने और कांपने लगते हैं। उनकी सांसे तेज चलती हैं। कभी खाने पीने से उनको अपनी सांस सीने में फंसी लगती है।  कभी चिंता या डर से शरीर कांपने लगता है।  इस तरह के संकटों में फंसा सामान्यजन जीवन का आंनद लिये बिना ही अपनी सांसों का कोटा पूरा कर लेता है।
                                          हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार संसार में सुख तथा दुःख केवल चित्त की अनुभूतियों का विषय है। ऐसा नहीं कि योगाभ्यासियों का संसार कोई स्थिर रहता है पर जब वह चित्त के सकट से जूझते हैं तो ध्यान के साथ ही भक्ति कर उसे स्थिर कर लेते हैं।  जब चित्त विक्षिप्तता के संकट में हो तब अपना ध्यान संसार से हटाकर परमात्मा में लगाना चाहिये।  कहीं एकांत, स्वच्छ तथा पवित्र स्थान पर सुखासन या पद्मासन में बैठकर अपना ध्यान नासिक के ऊपर भृकुटि पर केंद्रित करते हुए देह शिथिल करना चाहिये।  आष्टांग योग क्रिया में ध्यान एक केंद्रीय तत्व है जिससे धारणा की सीढ़ियों से समाधि के शिखर पर पहुंचा जाता है।
                                 हर मनुष्य जीवन गुजारने के लिये सांसरिक विषयों से जुड़ने के लिये बाध्य है। अंतर इतना है कि सामान्यजन इन विषयों में राग लिप्तता के बाद उससे प्राप्त क्लेश की निवृत्ति का मार्ग नहीं जानता जबकि योगसाधना ध्यान आदि से प्रवृत्तियों को स्थिर कर लेते हैं। यह लेखक पिछले बीस वर्षों से योग साधना का अभ्यास कर रहा है और अनुभव करता है कि योग साधना जीवन जीने की ऐसी कला है यह सभी कहते हैं पर इसकी अनुभूति बहुत कम लोग कर पाते हैं।  योगसाधना के नियमित अभ्यास से प्रवृत्ति और निवृत्ति के मार्ग को अ्रर्तचेतना से ही देखा जा सकता है। इस लेखक ने भारतीय योंग संस्थान के शिविरों में योग साधना का अभ्यास किया और पाया कि वहां के गैरपेशेवर शिक्षक जिस निष्काम भाव से  सिखाते हैं ऐसा अन्यत्र. देखने को नहीं मिलता।  इन शिक्षकों को योग के अभ्यास ने इतना निष्कामी बना दिया है कि यह लोग किसी से ईष्या या द्वेष नहीं करते-यह प्रवृत्ति कथित रूप से संतों में भी नहीं देखी जाती।

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